Dhatu Rog Ko Ayurvedic Upchar Se Kaise Thik Karen

Dhatu Rog Ko Ayurvedic Upchar Se Kaise Thik Karen

ये आयुर्वेदिक उपाय करें, भूल जाओगे धातु रोग!

धातु रोग(Spermatorrhea)-

किसी पुरूष के मन में कामेच्छा जागृत होने पर या अति उत्तेजना में आकर उसके लिंग में स्वतः ही सख्तपन व तनाव आ जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह कामेच्छा की भावना इतनी प्रबल होती है कि व्यक्ति के पुरूषांग के मुखाने से पानी के समान पतला-सा द्रव्यनुमा चिपचिपा लेस निकलने लगता है। हालांकि इस लेस की मात्रा इतनी कम होती है कि यह पुरूष के शिश्न से बाहर की ओर पूरी तरह से रूख नहीं कर पाती, किन्तु जब पुरूष के लिंग में बहुत देर तक तनाव रहता है और मन में कामवासना अधिक समय तक हावी रहती है, तब यह पतला द्रव्य शिश्न के मुख के ऊपरी भाग में आ जाता है, जिसको अंग्रेजी भाषा में ‘मेल-जी-स्पाॅट’ कहते हैं।

आज इस फैशनयुक्त आधुनिक वर्तमान मेें अधिकतर युवा स्त्री-पुरूष इतने अधिक एडवांस हो गये हैं या फिर उनका पारिवारिक व समाजिक वातावरण इतना स्वंतत्र हो गया है, कि उन पर किसी प्रकार की बंदिश या दबाव हो। इसके अलावा इंटरनेट, सोशियल मीडिया पर अश्लील साहित्य पढ़ना, अश्लील वीडियो देखने के कारण उनकी सोच में अनैतिकता की बढ़ोत्तरी हो रही है। उनकी मानसिकता इतनी ज्यादा कामुक हो गयी है कि वे अप्राकृतिक व गलत तरीके से अपने वीर्य और रज को नष्ट करने पर तुले रहते हैं। कई स्त्री-पुरूष तो अपनी काल्पनिक दुनियां में ही संभोग की परिकल्पना करते हुए सेक्स का आनंद लेने लगते हैं और फिर तन-मन में उत्तेजना हावी होने पर अप्राकृतिक तरीके(हस्तमैथुन आदि) से वीर्य निष्कासित करके तन को शीतलता प्रदान करने का प्रयास करते हैं।

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जब पुरूष के मन में कामवाना अधिक हावी हो और लंबे समय तक रहे, साथ ही वीर्य नष्ट न किया गया हो तो उनके शिश्न से लेस अधिक मात्रा में निकलनी आरंभ हो जाती है। जब यही स्थिति बहुत बार पुरूष के साथ पेश आये, तो एक समय वो भी आता है, कि किसी खूबसूरत स्त्री के संवेदनशील अंगों की परिकल्पना मात्र से ही उनका वीर्य निकलने लगता है और उत्तेजना ठंडी पड़ जाती है। यह सब प्रक्रिया सेक्स रोग की ओर इशारा करती है जिसे शुक्रमेह(धातु रोग) कहते हैं।

वैसे यहां जानकारी के लिए बता दें कि पुरूष के शिश्न से निकलने वाले इस पानीनुमा द्रव्य में वीर्य का अंश रत्ति मात्र भी नहीं मिलता है। लेकिन इसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका यह होती है कि ये लेस, पुरुष यौन-अंग की नाली को उचित मात्रा में चिकनाईयुक्त और तरलनुमा करने का काम करता है, जिसके कारण पुरूष को स्त्री-प्रसंग के दौरान वीर्य की गति से होने वाली हानि नहीं होती।

ये वो हैं प्रमुख कारण जिनसे होता है धातु रोग-

1. बहुत ज्यादा कामुक प्रवृत्ति का होना।

2. मन में बेचैनी रहना।

3. किसी प्रकार की चिंता व गहरा दुःख मन में होना।

4. शरीर में पोषक तत्वों व विटामिन्स के अभाव में।

5. किसी पुराने व लंबे रोग के कारण बहुत ज्यादा दवाईयों का सेवन करना।

6. दुबला-पतला शरीर होना और रोग-प्रतिरोधक क्षमता का घट जाना।

7. हर वक्त किसी गहरी सोच व चिंतन में डूबे रहना।

8. वीर्य का अत्यधिक पतला होना या किसी प्रकार का कोई अन्य वीर्य विकार होना।

9. लिंग की नसों का कमजोर होना।

10. अपने अनमोल रज(वीर्य) को अप्राकृतिक तरीके से नष्ट करना, अधिकहस्तमैथुन करना।

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लक्षणों को भी जानें-

1. यदि पेशाब व लैट्रिन के दौरान लिंग में दबाव की इच्छा महसूस हो, तो समझें कि धातु रोग होने वाला है या हो गया है।

2. पुरूषांग के मुखाने से पानी के समान द्रव्य टपकना।

3. वीर्य का पानी के समान बहुत ज्यादा पतलापन धातु रोग की ओर इंगित करता है।

4. शारीरिक रूप से दुबला हो जाना व कमज़ोरी महसूस होना।

5. साधारण व मामूली-सी बात में भी चिंता और झुंझलाहट में आ जाना।

6. शरीर के अंगों में कम्पन्न या कंपकंपाहट होना।

7. पेट से संबंधित समस्या रहना जैसे कब्ज, गैस आदि।

8. सांस की परेशानी रहना।

9. बाॅडी की पिंडलियों में पीड़ा की शिकायत होना।

10. थोड़ी या फिर अधिक मूर्छा आदि आना।

11. आलस्य व थकान बनी रहना।

12. दिल में खुशी व जोश का अभाव रहना और कोई भी काम करने का बिल्कुल मन न करना। यह सब लक्षण यदि व्यक्ति में पाये जायें तो समझें कि वह धातु रोग से पीड़ित है।

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इन आयुर्वेदिक उपायों से करें धातु रोग को दूर-

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1. मग़ज़ सिंघाड़ा 10 ग्राम, जावित्री 3 ग्राम। पीसकर बढ़ के दूध की सहायता से चने के बराबर गोलियां बना लें। दो गोली रात को सोते समय दूध के साथ दें। धातु रोग को नष्ट करने में बहुत ही लाभदायक योग है।

2. गोंद ढाक, ढाक वृक्ष की छाल, गूलर का गोंद, मौलसरी का गोंद, सिम्बल का गोंद, भुने चने, गुड़। समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनायें। 3 ग्राम सुबह-शाम ताजा पानी अथवा गाय के दूध से प्रयोग करें। यह चूर्ण वीर्यल्पता को दूर करता है, वीर्य उत्पन्न करता है तथा संभोग शक्ति को भी बढ़ाता है।

3. बरगद की दाढ़ी का चूर्ण वीर्य प्रमेह, स्वप्नदोष, वीर्य की कमी को दूर करता है।

4. जिसे वीर्य की अधिकता होने पर भी कामोत्तेजना न होती हो, वह गुजराती इलायची के दाने, जावित्री, लौंग, केशर, चिकनी सुपारी, दालचीनी, बहमन लाल और मिश्री, सेमर गोंद, गुलाब के फूल एक-एक तोला, चन्दन का बुरादा दो माशा, चाँदी का वर्क नौ नग, सोने के वर्क पांच नग, कस्तूरी दस रत्ती। सबको गुलाब जल में घोटकर चने जैसी गोलियां बना लें। एक-एक गोली सुबह-शाम मक्खन या गाय के दूध से लें। 40 दिन तक लें। अति उत्तम कामोत्तेजक, शक्ति-स्फूर्तिवर्धक, बाजीकरण राजयोग है।

Dhatu Rog Ko Ayurved Upchar Se Kaise Thik Karen

5. दरियाई नारियल 30 ग्राम, गिलोय का सत 10 ग्राम, मखाने की ठुर्री 40 ग्राम, सफेद मूसली 20 ग्राम, मिश्री 50 ग्राम, तालमखाना 30 ग्राम पीस-छान लें। 6 ग्राम सुबह-शाम मिश्रीयुक्त गाय के धारोष्ण दूध के साथ खाने से सब प्रकार का प्रमेह, धातु विकार दूर हो जाते हैं।

6. मूसली काली व सफेद, सालब मिश्री, शतावर, बीजबन्द, ऊटंगन के बीज, बहमन सफेद, बहमन लाल, तालमखाना, गोखरू, कौंच के बीज प्रत्येक 20 ग्राम, ईसबगोल का छिलका 20 ग्राम। प्रातः 2 ग्राम गर्म दूध से प्रयोग करें। यदि कब्ज़ हो तो हरड़ का मुरब्बा दो नग रात को सोते समय दूध से खा लिया करें। वीर्य संबंधी रोगों के लिए अनुपम भेंट है।

7. भिण्डी की जड़ छाया में शुष्क करें तथा थोड़ा कूटकर रख लें। आवश्यकता के समय इसमें से 10 ग्राम रात्रि को पाव भर पानी में भिगो दें। सुबह के समय मल-छानकर मिश्री मिलाकर पियें। निरंतर 21 दिन के प्रयोग से वीर्य प्रमेह दूर होकर वीर्य गाढ़ा हो जाता है और प्राकृतिक स्तम्भन शक्ति पैदा हो जाती है।

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