Dhat Girna Ki Samasya Ko Karen Pura Jad Se Khatam

Dhat Girna Ki Samasya Ko Karen Pura Jad Se Khatam

धातु रोग, प्रमेह(Spermatorrhoea)-

पुरूषों में बिना इच्छा के मल-मूत्र के दौरान हल्का-सा जोर या दबाव देने पर वीर्य पतले पानी के रूप में टकपने लगता है, जिसे धातु रोग या प्रमेह कहा जाता है।

जब बहुत ज्यादा सेक्स के या फिर अश्लील विचारों के बारे में सोचते रहने से उत्तेजनावश एकाएक लिंग में तनाव आने लगता है, जिस कारण पुरूषांग से पानी के रंग जैसी पतली चिपचिपी लेस निकलने लगती है। किन्तु इसी मात्रा इतनी कम होती है कि ये शिश्न के मुख द्वार तक नहीं पहुंच पाती। लेकिन जब अधिक देर तक उत्तेजना के कारण लिंग सख्त बना रहता है, तो वीर्य लिंग के मुख द्वार तक पहुंच जाता है।

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धातु रोग की आयुर्वेदिक उपचार पद्धति-

Dhat Girna Ki Samasya Ko Karen Pura Jad Se Khatam

1. हरड़ में वीर्यशोधक और वीर्यवर्धक तत्व पाये जाते हैं। आमला भी शीतवर्ण गुण के कारण शामक प्रभाव डालता है। हरड़, बहेड़ा और आमला तीनों सम अथवा असम भाग अपेक्षानुसार मिलाकर जो त्रिफला चूर्ण बनता है, वह प्रमेह में बहुत हितकर रहता है। शिलाजीत भी इसमें लाभ करती है। आवश्यक नहीं कि बहुत मूल्यवान अमीरी दवायें ही सेवन की जायें, अल्प मूल्य के गरीबी प्रयोग भी कभी-कभी चमत्कारिक लाभ उत्पन्न करते हैं।

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2. हरड़ साफ, जिस पर चैमासा न निकला हो, क्योंकि वर्षाऋतु में कष्टौषधियों के गुण कम हो जाते हैं, कूट-छानकर रखें। यह चूर्ण प्रातःकाल शहद के साथ, एक चम्मच की मात्रा में सेवन करें तथा रात्रि में सोते समय इस चूर्ण को फांक कर ऊपर से दूध पियें। इस प्रकार यह चूर्ण अकेला ही प्रमेह रोग पर बहुत काम करता है। हरड़ में निःसारक गुण है, इसलिए रोगी को कब्ज़ भी नहीं रह पाता।

3. आवलें के चूर्ण को आवलों के ही रस में तीन दिन घोटें और सुरक्षित रखें। यह चूर्ण रसायन गुण वाला होकर सभी प्रकार के प्रमेह रोगों को दूर करता है। इसकी मात्रा एक ग्राम की है, प्रातः-सायं शहद के साथ लेनी चाहिए।

4. त्रिफला(हरड़, बहेड़ा, आंवला) का चूर्ण 3 से 5 ग्राम की मात्रा में रोगी का बलाबल देखकर शहद के साथ सुबह-शाम देनी चाहिए। यह भी धातु की समस्या में बहुत लाभकारी है।

5. त्रिफला चूर्ण का सेवन 5 से 10 ग्राम की मात्रा में रात्रि में सोते समय गाय के दूध में मिश्री मिलाकर देने से पित्तजन्य पुरूष रोगों में लाभ होता है।

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6. हरड़ का वक्कल, बहेड़े का वक्कल तथा गुठली रहित आंवले, बबूल के पुष्प, हल्दी और छोटी दूधी यह सभी द्रव्य समान भाग लेकर कूट-कपड़छान करें और इस चूर्ण का जितना वजन हो, उतना ही मिश्री मिलायें।
मात्रा- 5 से 10 ग्राम तक गाय के दूध के साथ रात में सोते समय सेवन करें। इससे कब्ज़ भी मिटता है और क्षुधा की भी वृद्धि होती है। धात रोग में उत्तम योग है।

7. जौ का साफ ताजा आटा सब प्रकार के प्रमेह में लाभकारी रहता है। इसे भोजन के रूप में तो प्रयोग किया ही जाता है, दवा के रूप में भी काम में लिया जाता है। इसके लिए जौ का आटा एक चम्मच शहद के साथ सुबह के समय शहद के साथ नाश्ते के स्थान पर सेवन करना चाहिए। जौ का आटा पंजीरी के रूप में भून लेना चाहिए। कम से कम 30-40 दिन सेवन करें।

8. छोटी इलायची के बीज और शर्करा समान भाग लेकर चूर्ण बना लें। इसे 1 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम शहद के साथ सेवन करना चाहिए। मधुमेह(शुगर) में इसे ना दें, अन्य सभी प्रमेहों में हितकर है। छोटी इलायची का चूर्ण शर्करा के शर्बत के साथ सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।

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9. हल्दी का चूर्ण 3 से 5 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सेवन करने से सब प्रकार के प्रमेह दूर होते हैं।

10. छोटी दूधी छाया-शुष्क करके, समान भाग मिश्री के साथ खरल करें।
मात्रा- 5 से 10 ग्राम तक गौ-दुग्ध के साथ सेवन करनी चाहिए। सब प्रकार के प्रमेह में लाभकारी है।

11. बबूल की छाल, महुए की छाल और कटहल की छाल समान भाग लेकर, कपड़छन चूर्ण बनायें। यह चूर्ण 150 ग्राम में 1 ग्राम चांदी की भस्म मिलाकर पुनः खरल करें। मात्रा 5 ग्राम, सुबह-शाम शहद मिलाकर लेनी चाहिए। प्रमेह के सभी भेदों में यह दवा लाभदायक रहती है।

12. असगंध और विधायरा समान भाग लेकर कूट-कपड़छन करें। यही आयुर्वेद का प्रसिद्ध अश्वगन्धादि चूर्ण है। इसकी मात्रा 4 से 8 ग्राम तक रोगी का बलाबल विचार कर देनी चाहिए। अनुपात में मिश्रीयुक्त गौदुग्ध दिया जाये। सुबह के समय कम से कम 40 दिन प्रयोग करें। इससे शरीर में शक्ति बढ़ती है तथा सभी प्रकार के प्रमेह नष्ट होते हैं। इसके सेवन से कब्ज़ हो सकता है, इसलिए कभी-कभी रात्रि में सोते समय त्रिफला की फंकी दूध के साथ ली जा सकती है।

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13. निर्मली के बीज थोड़े से स्वच्छ जल के साथ चन्दन के समान घिसें अथवा पीस लें और छानकर रस निकालें। यह रस 2 ग्राम में आधा ग्राम काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन कराना चाहिए। यह सभी प्रकार के प्रमेह रोग में लाभकारी है।

14. शुद्ध शिलाजीत 1-2 ग्राम को शहद के साथ 3-4 सप्ताह तक निरंतर सेवन करने से सब प्रकार के प्रमेह दूर होते हैं।

15. महुए की छाल 5 ग्राम, काली मिर्च आधा ग्राम लेकर पानी के साथ पीसें। इससे भी प्रमेह के सभी लक्षण दूर होते हैं।

16. केला की पकी हुई फली का गूदा, मिश्री, मधु एक साथ घोट लें और उसमें हरे आंवले का स्वरस मिलाकर सेवन करायें। इससे वीर्यस्राव तथा पतले हुए वीर्य में लाभ होता है। बाल-वृद्धि तथा वीर्य को गाढ़ा करने वाला सुंदर प्रयोग है।

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