Ayurvedic remedy in Spermatorrhea disease धातु रोग में आयुर्वेदिक उपाए

Ayurvedic remedy in Spermatorrhea disease धातु रोग में आयुर्वेदिक उपाए

धातु रोग को वीर्य प्रमेह, शुक्रमेह के अलावा जरयान नाम से भी संबंधित किया जाता है। बिना इच्छा के अथवा बिना किसी लैंगिक उत्तेजना के जब मल-मूत्र त्याग करते समय वीर्य निकलता है, तब उस अवस्था को धातु रोग नाम दिया गया है। धातु रोग ज्यादातर उन लोगों को होता है, जो बचपन से ही कुंसग में पड़कर वीर्य का नाश करने लग जाते हैं। बचपन से ही वीर्यनाश होते रहने से प्रजनांग कमजोर, असहाय तथा शिथिल पड़ जाते हैं। जिसका फल यह निकलता है कि वीर्य धारण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है। धारण शक्ति न रहने से असमय मल-मूत्र का जोर पड़ते ही वीर्य निकल जाता है। बचपन से ही हस्तमैथुन की आदत पाल लेना इस रोग का मूल कारण माना जाता है।
धातु रोग का शिकार रोगी दिन-ब-दिन कमजोर व दुर्बल होता चला जाता है। रोगी हर समय अनमना आलस्य से पीड़ित रहता है। उसका किसी काम को जी नहीं करता। थोड़ा-सा काम करते ही रोगी थक जाता है, हांफने लगता है।
इस रोग की पहचान सहज सरल है। रोगी जब मल त्याग के लिए जोर लगाता है अथवा मूत्र त्याग के लिए जाता है, उसी वक्त वीर्य निकल जाता है। रोग जब अत्यधिक तीव्र भयंकर अवस्था का हो जाता है, तब मामूली-सी रगड़ लगते ही वीर्यपात होने लगता है। कई रोगी स्त्री का ख्याल आते ही अथवा कल्पना करते ही अथवा स्त्री के पास जाते ही, अश्लील फोटो देखते ही सहसा वीर्यपात हो जाने की शिकायत करते हैं।
एक रोगी ने आकर कहा, ”वह फिल्म देखने इसलिए नहीं जाता, क्योंकि फिल्म में प्रेमालाप-आलिंगन आदि के दृश्य देखते ही बिना उत्तेजना के वीर्यपात हो जाता है।“
आयुर्वेदानुसार मिथ्या आहार-विहार के परिणामस्वरूप जब वात, पित्त और कफ दूषित होकर चिकने गाढ़े, श्वेत, लेसदार, मलों को साथ लेता हुआ मूत्र जब अनेक रूपों और रंगों में शरीर से बाहर निकलता है, तब उस अवस्था को प्रमेह या धातु रोग कहा जाता है।

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धातु रोग के प्रमुख कारण:
1. बचपन से ही वीर्यनाश करते रहना।
2. वीर्य धारण करने की शक्ति का अभाव हो जाना।
3. अत्यधिक पौष्टिक पदार्थ प्रयोग करना।
4. अत्यधिक उत्तेजक खाद्य-पेय का प्रयोग करना।
5. प्रजननांगों की निर्बलता व कमजोरी।
6. हस्तमैथुन की आदत पाले रहना।
7. कब्ज़ का बने रहना।
8. पाचन दोष भी इस रोग के लिए जिम्मेदार है।
9. खाया-पिया हजम न हो पाना।
10. अजीर्ण रोग की उपस्थिति
11. अत्यधिक स्त्रियों के साथ मैथुन करना।
12. आहार-विहार दूषित हो जाना।
13. दिनरात एक ही स्थान पर अधिक समय तक बैठे रहना।
14. अधिक समय तक सोना।
15. दिन के समय सोना।
16. खाना खाते ही सो जाना।
17. अत्यधिक परिश्रम करना।
18. परिश्रम का अभाव हो जाना।
19. सारहीन दूध-दही प्रयोग करना।
20. अत्यधिक मीठे पदार्थ गुड़-शक्कर, मिठाइयां खाना।
21. खटाई और खटाई युक्त तीखे खाद्य-पेय प्रयोग करना।
22. शारीरिक बल की कमी हो जाना।
23. अत्यधिक सिगरेट तम्बाकू का प्रयोग।
24. मांस-मछली, अण्डों का अत्यधिक प्रयोग।
25. अत्यधिक मदिरापान करना।
26. अत्यधिक गांजा-भांग, चरस, अफीम अथवा अन्य नशीले पदार्थ प्रयोग करना।
27. वात, पित्त तथा कफ प्रकुपित हो जाना।
28. ब्लू फिल्में देखना।
29. अश्लील गंदे मैथुनरत चित्र देखना।
30. अश्लील गंदी पुस्तकें देखना।
31. अप्राकृतिक मैथुन करना।
32. वीर्य अत्यधिक पतला और कमजोर हो जाना।

धातु रोग के प्रमुख लक्षण:
धातु रोग के प्रमुख लक्षण नीचे सविस्तार उल्लेख किए जा रहे हैं, जो इस प्रकार है-
1. मल-मूत्र त्याग करते समय अथवा बिना किसी उत्तेजना के वीर्य निकलते रहना इस रोग का मुख्य कारण है, जिससे इस रोग को स्पष्ट पहचाना जा सकता है।
2. रोगी चिंता व तनाव ग्रस्त रहता है।
3. रोगी आलस्य का शिकार रहता है।
4. रोगी का किसी काम मंे मन नहीं लगता।
5. रोगी कंठ में पीड़ा की शिकायत करता है।
6. रोगी अरूचि का शिकार हो जाता है।
7. भोजन की इच्छा मर जाती है।
8. रोगी अनिंद्रा का शिकार हो जाता है।
9. रोगी कमर दर्द से पीड़ित रहता है
10. अक्सर कब्ज़ बनी रहती है।
11. पाचन दोष से रोगी अक्सर पीड़ित रहता है।
12. रोगी शारीरिक निर्बलता, कमजोरी की शिकायत करता है।
13. रोगी सिरदर्द से पीड़ित रहता है।
14. रोगी श्वास-कास से पीड़ित रहता है।
15. रोगी जी मिचलाने की शिकायत करता है।
16. रोगी मसाने में दर्द-पीड़ा, वेदना की शिकायत करता है।
17. मूत्र मार्ग से सुई के चुभने जैसी पीड़ा की शिकायत रोगी करता है।
18. रोगी को प्यास अधिक लगती है।
19. मामूली रगड़ से वीर्य निकल जाता है।
20. स्त्री का ख्याल करते ही अथवा स्त्री के पास जाते ही अथवा स्त्री द्वारा शिश्न का स्पर्श करते ही वीर्य निकल जाता है।
21. कामोत्तजक वातावरण में आते ही वीर्य निकल जाता है।
22. रोगी को हरारत रहती है।
23. कई रोगी ज्वर रहने की शिकायत करते हैं।
24. रोगी अम्लपित्त का शिकार रहता है।
25. रोगी घबराहट अनुभव करता है।

नोट- धातु रोग की चिकित्सा ‘स्वप्नदोष’ की चिकित्सा की तरह की जाती है। बाकी औषधियां स्वप्नदोष प्रकरण में देखें। स्वप्नदोष और प्रमेह नष्ट हो जाने उपरांत रोगी को पौष्टिक शक्तिवर्धक तथा वीर्य को गाढ़ा करने वाली औषधियां प्रयोग करने के लिए दें। पथ्य कराने से लाभ होता है। अपथ्य से रोग बढ़ता है। दूध, घी, मक्खन, मलाई, रबड़ी आदि पौष्टिक पदार्थ बंद करायें। इससे रोग तेजी से बढ़ता है। पथ्य का आचरण करने से रोग बिना किसी औषधि के ठीक हो जाता है। ध्यान रखें, रोगी यदि अपथ्य कर रहा हो, तो उसकी चिकित्सा व्यर्थ है। रोग के मूल कारणों की चिकित्सा करें।
– यकृत विकार तथा उदर विकारों के कारण मूत्र में ‘फास्फेट’ आने लगते हैं। कई चिकित्सक भूलवश उसी को वीर्य बताने लगते हैं।
– इस रोग में रोगी के पाचन संस्थान को सबल बनाने की औषधियां प्रथम प्रयोग करानी चाहिए।
– कब्ज़ हो तो प्रथम कब्ज़ को दूर करना कत्र्तव्य है। आतें साफ रहने से कई रोग स्वयं ही दूर हो जाते हैं।
– रोगी को निर्देश दें कि वह बिना वजह जननेंद्रियों को उत्तेजित न होने दें। अनावश्यक उत्तेजना, बुरी आदतों से रोगी को बाज आने का निर्देश दें।

धातु रोग का उपचार आयुर्वेद से-
गिलोय: धातु रोग से छुटकारा पाने के लिए 2 चम्मच गिलोय के रस में 1 चम्मच शहद मिलाकर सेवन करें।

आंवले: रोजाना सुबह खाली पेट दो चम्मच आंवले के रस को शहद के साथ लेने से जल्द ही धातु में गाढ़ापन आने लगता है। आंवले के चूर्ण को दूध में मिला कर नियमित सुबह-शाम लेने से भी धातु रोग में राहत मिलती है।

तुलसी: दोपहर के भोजन के बाद 3 से 4 ग्राम तुलसी के बीज और थोड़ी सी मिश्री को मिलाकर खाने से धातु रोग में तुरन्त फायदा होता है।

मुसली: 10 ग्राम सफेद मुसली का चूर्ण में मिश्री मिलाकर खाने से और उसके बाद ऊपर से लगभग 500 ग्राम गाय का दूध पीने से बहुत लाभ पहुंचता है। इस उपाय से शरीर को अंदरूनी शक्ति मिलती है और व्यक्ति के शरीर को रोगों से लड़ने के लिए शक्ति मिलती है।

उड़द की दाल: उड़द की दाल को अच्छे से पीसकर खांड में भुन लिया जाए और खांड में मिलाकर खाने से भी चमत्कारी फायदा मिलता है।

जामुन की गुठली: धूप में जामुन की गुठलियों को अच्छे से सुखा कर उसका चूर्ण बना लें और उसे नित्य दूध के साथ खायें। कुछ हफ्तों में ही धातु रोग में आराम मिलेगा।

कौंच के बीज: 100-100 ग्राम की मात्रा में ड्राय फ्रूट्स और कौंच के बीज लेकर उन्हें पीस कर उनका पाउडर बना लें और फिर उसमे 200 ग्राम पीसी हुई मिश्री मिला लें। अब इस मिश्रण के रोज आधा चम्मच को गुनगुने दूध में मिलाकर पीने से वीर्य का पतलापन दूर होता है और धातु रोग में लाभ मिलता है।

शतावरी मुलहठी: 50 ग्राम शतावरी, 50 ग्राम मुलहठी, 25 ग्राम छोटी इलायची के बीज, 25 ग्राम बंशलोचन, 25 ग्राम शीतलचीनी और 4 ग्राम बंगभस्म, 50 ग्राम सालब मिसरी लेकर, इन सभी चीजों को अच्छे से सुखाकर चूर्ण बना लें। उसके बाद इसमें 60 ग्राम चाँदी का वर्क मिलाएं और प्राप्त चूर्ण को (60 ग्राम ) सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करें।
उपरोक्त बताये उपाय करने से कितना भी पुराना धातु रोग हो, ठीक हो जाता है।

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