Ab Dhatu Rog Hoga Door, Bas Apnayen Ye Desi Nuskhe अब धातु रोग होगा दूर, बस अपनाएं ये देसी नुस्खे

Ab Dhatu Rog Hoga Door, Bas Apnayen Ye Desi Nuskhe अब धातु रोग होगा दूर, बस अपनाएं ये देसी नुस्खे

धातु रोग, प्रमेह (Spermatorrhoea)-

वात, पित्त और कफ़ जैसे दोषों के कुपित होने से पाचन संस्थान प्रभावित होता है, साथ ही चिकने, गाढ़े, सफेद और लेसदार(चिपचिपा) स्राव मूत्र के साथ जो आता है, उसे ‘प्रमेह’ यानी धात  जाने की समस्या कहा जाता है। इससे स्पष्ट है कि धात गिरने की समस्या का मूल कारण ‘पाचन विकार’ ही है।

धातु रोग के कारण-

इस रोग का मुख्य कारण ‘पाचन विकार’ हो सकते हैं। इसके साथ-साथ अन्य कारण भी हैं, जिसे ध्यान में रखना आवश्यक है जैसे- अति संभोग या शुक्रक्षरण, हस्तमैथुन, आहार-विहार की अनियमितता, अति श्रम या श्रम से पूरी तरह दूर रहना, दही गुड़, मिर्च, खट्टाई आदि का अधिक प्रयोग करना, गांजा, भांग, चरस, तम्बाकू, सिगरेट आदि का अधिक सेवन करना आदि इस रोग के उत्प्रेरक(बढ़ाने वाले) हैं।

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धातु रोग कैसे होता है?

इसका गहरा संबंध पाचन संस्थान से होता है। अजीर्ण होने से वृक्कों के अंदर क्षारीय पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे वृक्कों के छिद्र क्षार की अधिकता से कुछ न कुछ गलकर चैडे़ हो जाते हैं। परिणामस्वरूप वृक्क अपना काम संतोषजनक ढंग से नहीं कर पाते और विभिन्न प्रकार के रंगों और रूपों में वे गंदे पदार्थ मूत्र के साथ निकल जाते हैं, जिसे हम धातु की समस्या कहते हैं।

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स्वप्नदोष भी प्रमेह की ही प्रारम्भिक स्थिति है। अतः ऐसी स्थिति होते ही सावधान हो जायें।

धातु रोग से पीड़ित रोगी का आहार-

पुराना गेहूं, पुराने चावल, अरहर, चने की दाल, तिल, सहजन, परवल, करेला, गूलर, लहसुन, जामुन, खजूर आदि।

अपथ्य-

धूम्रपान, दिन में सोना, मांस, सेम, शराब, तेल, दूध, घी, गुड़, खट्टाई, लौकी, कद्दू, संभोग, मूत्रवेग को रोकना आदि।

धात(प्रमेह) का स्राव-

वास्तविक रूप में धातु स्राव, वीर्य नहीं होता है, जिसे भ्रमवश रोगी वीर्य समझ लेता है। यह एक प्रकार का फाॅस्फेटयुक्त स्राव होता है, जिसका मूल कारण पाचन तंत्र विकार, यकृत विकार आदि है। जब चिकित्सा प्रारम्भ करें, तो सर्वप्रथम इन्हें स्वस्थ करें। यदि रोगी को कब्ज़ की शिकायत रहती हो, तो इसे भी सबसे पहले दूर करने का प्रयास करें।

धातु रोग और देसी नुस्खे-

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1. जंगली अजवायन के क्वाथ में सिरके का योग देकर एवं मधु(शहद) मिलाकर देने से आशातीत लाभ होता है। 40-50 मि.ली. सुबह-शाम दें।

2. अपराजिता की जड़ का फांट सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।

3. शतावरी का चूर्ण 10 से 20 ग्राम चीनी का योग दूध में देकर पेय बनाकर सुबह-शाम सेवन करने से शुक्रमेह में लाभ होता है।

4. बरियार(खरैंटी) के पंचाँग का रस 10 मि.ली. प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है। वीर्य प्रमेह पूरी तरह ठीक हो जाता है।

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5. आंवलों का स्वरस 10 मि.ली. तथा हल्दी 2 ग्राम शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से आशातीत लाभ होता है।

6. चावलों के धोवन(तण्डुलोदक) में चन्दन घिसकर 10-20 ग्राम प्रति मात्रा प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।

7. चन्दन का क्वाथ 50 मि.ली. सुबह-शाम दें, लाभ होगा।

8. केले का स्तम्भ(तने) या कन्द का स्वरस 20 से 40 मि.ली. सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।

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